सचमुच किसी मृगतृष्णा के समान ही है ' दशहरे में रावण के पुतले का जलना '
हमें लगता है /असत्य पे सत्य की जीत हो गई / बुराइयों का अंत हो गया /
लेकिन ,दुसरे ही दिन सदभावनाओं से जब हमारा स्वार्थ फिर से बड़ा हो
जाता है /
एक नया रावण हमारे सामने दुबारा खड़ा हो जाता है
shiva mohanti
shiva.pithora@gmail.com
09425521327
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