ये कैसा रिवाज है ,
अंधियारे का राज है /
पंछी है सहमे-सहमे से ,
ऊपर उड़ता बाज है //
उपवन में सूनापन है ,और दर्द बहुत है माली में
दीपक का संघर्ष व्यर्थ है ,इस बेनूर दीवाली में //
जहरीले परिवेश में
जीवन बन गई लाश ,
हरियाली भयभीत है,
और बेरंगा पलाश /
पेड़ों का कटना निश्चित है ,दहशत है अब डाली में /
दीपक का संघर्ष व्यर्थ है ,इस बेनूर दीवाली में //
छदम आचरण छदम आवरण ,
और छदम व्यवहार /
सत्ताधारी की पौ बारह
जनता है लाचार /
राजनीति तब्दील हो गई एक भयंकर गाली में /
दीपक का संघर्ष व्यर्थ है इस बेनूर .................
संशय के बादल छायें है ,
दबी- दबी यह चर्चा है /
आमदनी तो सीमित है ,
और लम्बा चौड़ा खर्चा है //
कैसे ये त्यौहार मनेगा बोलो तो तंगहाली में,
दीपक का संघर्ष व्यर्थ है इस बेनूर ...........
शिवा मोहंती पिथोरा
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